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Thursday, May 31, 2012

जिज्ञासु :-वह कोनसा जप या पूजा हे जिसमैं न माला


 जिज्ञासु :-
हे गुरुदेव वह कोनसा जप या पूजा हे जिसमैं न माला, न आसन ,न तसवीर  और न किसी विधि विधान की जरूरत हो ?और जो सभी पूजा पद्धतियों से उत्तम भी हो !
महाराजश्री:-
जिस पूजन या जप मैं माला ,आसन ,तसवीर  और न किसी विधि विधान की जरूरत नहीं होती वह मानसिक पूजन और अजपाजप है ! और यही सभी पूजा पद्धतियों मैं श्रेष्ठ  भी है ! भगवान को आप मन से पूजें ,मानसिक कल्पना करें कि मैं उन्हे स्नान करवा रहा हूं ,दिव्य वस्त्र अर्पित कर रहा हूं ,नन्दन वन के फूल चढा रहा हूं ,कामधेनु गाय के दूध से भग्वान का भोग लगा रहा हूं ! मेरे प्रभु की आरती मैं आकाश मण्डल से स्वय चांद-सितारे उपस्थित हो गए हैं ,पिता परमात्मा दिव्य,स्वरूप मैं मेरे सामने विराजमान होकर पूजन को स्वीकार कर रहे हैं और आती-जाती सांस मैं प्रभु नाम को बसा लें कोई भी कार्य करें प्रभु का नाम अन्दर-अन्दर चलता  रहे !

: आज का विचार - 31/5/12



---------- Forwarded message ----------
From: Praveen Verma


भाग्य आपको परिस्थितियॉ देता है, पर पुरुषार्थ उनसे निकलने की हिम्मत देता है।



परम पूज्य सुधांशुजी महाराज

परम पूज्य सुधांशुजी महाराज 

 

Destiny or fate may present you with harsh circumstances but with diligence and perseverance, the path to overcoming these circumstances is provided.

Humble Devotee 

Wednesday, May 30, 2012

आज का जीवन सूत्र-३०-५-२०१२

आज का जीवन सूत्र-३०-५-२०१२
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भगवान् से मांगो 
मीरा की भक्ति ,
शिव की शक्ति ,
गणेश की सिद्धि ,
चाणक्य की बुद्धि ,
कर्ण क़ा दान ,
शारदा क़ा ज्ञान ,
राम की मर्यादा ,
कुबेर की सम्पदा !
परम पूज्य सुधांशुजी महाराज

Friday, May 25, 2012

mala main 108 manke kyon



जब हम माला करते है तो मन में अक्सर ये प्रश्न
आता है कि माला में १०८ मनके ही क्यों होते
है.इससे कम
या ज्यादा क्यों नहीं ? हमारे धर्म में 108
की संख्या महत्वपूर्ण मानी गई है. ईश्वर नाम के
जप, मंत्र जप, पूजा स्थल या आराध्य
की परिक्रमा, दान इत्यादि में इस
गणना को महत्व दिया जाता है. जपमाला में
इसीलिए 108 मणियाँ या मनके होते हैं.
उपनिषदों की संख्या भी 108 ही है. विशिष्ट
धर्मगुरुओं के नाम के साथ इस संख्या को लिखने
की परंपरा है. तंत्र में उल्लेखित देवी अनुष्ठान
भी इतने ही हैं. परंपरानुसार इस
संख्या का प्रयोग तो सभी करते हैं, लेकिन
इसको अपनाने के रहस्यों से ज्यादातर लोग
अनभिज्ञ होंगे. अतः इस हेतु कुछ तथ्य प्रस्तुत हैं-
1. - इस विषय में धार्मिक ग्रन्थों में अनेक मत
हैं .एक मत के अनुसार हम २४ घंटों में २१,६००
बार सांस लेते हैं. १२ घंटे का समय
अपनी दिनचर्या हेतु निर्धारित है और बाकी के
१२ घंटे का समय देव आराधना हेतु. अर्थात
१०,८०० सांसों में ईष्टदेव का स्मरण
करना चाहिये, किन्तु इतना समय दे
पाना मुश्किल है. अत: अन्तिम दो शून्य हटा कर
शेष १०८ सांसों में प्रभु स्मरण का विधान
बनाया गया है .
इसी प्रकार मणियों की संख्या १०८
निर्धारित की गयी है.
2.- दूसरी विचारधारा के अनुसार सॄष्टि के
रचयिता ब्रह्म हैं. यह एक शाश्वत सत्य है. उससे
उत्पन्न अहंकार के दो गुण होते हैं , बुद्धि के
तीन , मन के चार , आकाश के पांच , वायु के छ,
अग्नि के सात, जल के आठ और पॄथ्वी के नौ गुण
मनुस्मॄति में बताये गये हैं. प्रक्रिति से ही समस्त
ब्रह्मांड और शरीर की सॄष्टि होती है. ब्रह्म
की संख्या एक है जो माला मे सुमेरु की है. शेष
प्रकॄति के २+३+४+५+६+७+८+९=४४
गुण हुये. जीव ब्रह्म
की परा प्रकॄति कही गयी है. इसके १० गुण हैं.
इस प्रकार यह संख्या ५४ हो गयी ,
जो माला के
मणियों की आधी संख्या है ,जो केवल
उत्पत्ति की है. उत्पत्ति के विपरीत प्रलय
भी होती है,
उसकी भी संख्या ५४ होगी. इस माला के
मणियों की संख्या १०८ होती है.
माला में सुमेरु ब्रह्म जीव की एकता दर्शाता है.
ब्रह्म और जीव मे अंतर यही है कि ब्रह्म
की संख्या एक है और जीव की दस इसमें शून्य
माया का प्रतीक है, जब तक वह जीव के साथ है
तब तक जीव बंधन में है. शून्य का लोप हो जाने से
जीव ब्रह्ममय हो जाता है.
माला का यही उद्देश्य है कि जीव जब तक १०८
मणियों का विचार नहीं करता और कारण स्वरूप
सुमेरु तक नहीं पहुंचता तब तक वह इस १०८ में
ही घूमता रहता है . जब सुमेरु रूप अपने
वास्तविक स्वरूप की पहचान प्राप्त कर लेता है
तब वह १०८ से निवॄत्त हो जाता है अर्थात
माला समाप्त हो जाती है. फ़िर सुमेरु
को लांघा नहीं जाता बल्कि उसे उलट कर फ़िर
शुरु से १०८ का चक्र प्रारंभ किया जाता है
108 की संख्या परब्रह्म की प्रतीक
मानी जाती है. 9 का अंक ब्रह्म का प्रतीक है.
विष्णु व सूर्य की एकात्मकता मानी गई है
अतः विष्णु सहित 12 सूर्य या आदित्य हैं.
ब्रह्म के 9 व आदित्य के 12 इस प्रकार
इनका गुणन 108 होता है. इसीलिए परब्रह्म
की पर्याय इस संख्या को पवित्र
माना जाता है. 3.- मानव जीवन की 12
राशियाँ हैं. ये राशियाँ 9 ग्रहों से प्रभावित
रहती हैं. इन दोनों संख्याओं का गुणन भी 108
होता है.
4.- नभ में 27 नक्षत्र हैं. इनके 4-4 पाद
या चरण होते हैं. 27 का 4 से गुणा 108
होता है. ज्योतिष में भी इनके गुणन अनुसार
उत्पन्न 108 महादशाओं की चर्चा की गई है.
5.- ऋग्वेद में ऋचाओं की संख्या 10 हजार 800
है. 2 शून्य हटाने पर 108 होती है.
6.- शांडिल्य विद्यानुसार यज्ञ वेदी में 10
हजार 800
ईंटों की आवश्यकता मानी गई है. 2 शून्य कम कर
यही संख्या शेष रहती है. जैन मतानुसार भी अक्ष
माला में 108 दाने रखने का विधान है. यह
विधान गुणों पर आधारित है. अर्हन्त के 12,
सिद्ध के 8, आचार्य के 36, उपाध्याय के 25व
साधु के 27 इस प्रकार पंच परमिष्ठ के कुल
108 गुण होते हैं. "जय जय श्री राधे"

पूज्य गुरुदेव :-



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परम पूज्य सुधांशुजी महाराज

: पूज्य गुरुदेव :-: पूज्य गुरुदेव :- इस मानव जीवन  का सदुपयोग कैसे करें ? इस जीवन  का उद्देश्य क्या है और इसे कैसे पहचानें ? महाराजश्री :- शास्त्रों मै ...



पूज्य गुरुदेव :- इस मानव जीवन का सदुपयोग कैसे करें



पूज्य गुरुदेव :-
इस मानव जीवन  का सदुपयोग कैसे करें ? इस जीवन  का उद्देश्य क्या है और इसे कैसे पहचानें ?
महाराजश्री :-
शास्त्रों मै धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष पुरुशार्थ ,चतुश्टय के माध्यम से जीवन के लक्ष्य प्राप्ति की बात कही गयी है !मनुष्य को अपनी रुचि और स्थिति के अनुसार ज्ञान -कर्म -उपासना के माध्यम से भग्वत्प्राप्ति के साधन मै लग जाना ही जीवन का सदुपयोग है !यह जीवन पिता परमात्मा की वाटिका का सर्वोत्तम पुष्प है ,इसका सौन्द्र्य सुगन्ध और आकषर्ण बना रहे !संसार को अपने सत्कर्मों से आकर्षित करता रहे !प्रत्येक कर्तव्य का निष्काम भाव से पालन करे , शरीर स्वास्त्य का भी पूरा ध्यान रखें ,क्योंकि यह साधना धाम है ,जिसमे प्रभु विराजमान हैं और उस आत्मस्थ परमात्मा की अनुभूति कर लेना ही इस जीवन का परम उद्देश्य है !

Wednesday, May 23, 2012

मानव जीवन का सदुपयोग कैसे करें



पूज्य गुरुदेव :-
इस मानव जीवन  का सदुपयोग कैसे करें ? इस जीवन  का उद्देश्य क्या है और इसे कैसे पहचानें ?
महाराजश्री :-
शास्त्रों मै धर्म ,अर्थ ,काम ,मोक्ष पुरुशार्थ ,चतुश्टय  के माध्यम से जीवन के लक्ष्य प्राप्ति की बात कही गयी है !मनुष्य को अपनी रुचि और स्थिति के अनुसार ज्ञान -कर्म -उपासना के माध्यम से भग्वत्प्राप्ति के साधन मै लग जाना ही जीवन का सदुपयोग है !यह जीवन पिता परमात्मा की वाटिका का सर्वोत्तम पुष्प है ,इसका सौन्द्र्य सुगन्ध और आकषर्ण बना रहे !संसार को अपने सत्कर्मों से आकर्षित करता रहे !प्रत्येक कर्तव्य का निष्काम भाव से पालन करे , शरीर स्वास्त्य का भी पूरा ध्यान रखें ,क्योंकि यह साधना धाम है ,जिसमे प्रभु विराजमान हैं और उस आत्मस्थ परमात्मा की अनुभूति कर लेना ही इस जीवन का परम उद्देश्य है !

आज का जीवन सूत्र

आज का जीवन सूत्र-२३-५-२०१२-
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चहरे पर मुस्कान हो , ह्रदय दया से भरपूर हो ,वाणी में मिठास हो ,हाथ परोपकार  से भरे हों , ऐसा व्यक्ति ही परमात्मा की गोद में बैठने क़ा अधिकारी है !
परम पूज्य सुधांशुजी महाराज

Sunday, May 20, 2012

जो सहज प्राप्त होता है

मनुष्य की आदत है जो सहज प्राप्त होता है उसकी कीमत नहीं समझता और दूर होजाने पर वही उसे बहुत काम क़ा समझ आता है !

Saturday, May 19, 2012

आज का जीवन सूत्र१९-५-२०१२

आज का जीवन सूत्र१९-५-२०१२ 
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सदगुरु अपनी वाणी से परमात्मा क़ा संदेश ,दर्शन से परमात्मा की अनुभूति और आशीर्वाद से परमात्मा की कृपाओं क़ा अमृत बरसाते हैं !

परम पूज्य सुधांशुजी महाराज

Friday, May 18, 2012

Refrigerato

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Wednesday, May 16, 2012

गुरुवाणी 15-5-2012

गुरुवाणी  
उपाधियाँ आदमी के जीवन को नष्ट करती हैं !समानता की दृष्टी हो जाय तो आदमी दुर्व्यवहार नहीं करता !
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परम पूज्य सुधांशुजी महाराज



आज का जीवन सूत्र १६-५-२०१२

आज का जीवन सूत्र-१६-५-२०१२ 
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जिंदगी को आनंदमयी बनाने के लिये चार चीजे याद रखो :-
अर्ज :- भगवान् के दरबार में अपनी अर्जी लगाते रहो !
मर्ज:- तन में मर्ज रहने मत् दो !
फर्ज:-अपना फर्ज निभाते रहो !
कर्ज:- सिर पर कर्ज चढ़ने मत् दो !

परम पूज्य सुधांशुजी महाराज

प्रशन :-हम प्रयास भुत करते हैं लेकिन लेकिन कमाई मैं बरकत नहीं होती

जिग्यासा और समाधान 
प्रशन :-
हम प्रयास बहुत  करते हैं लेकिन  कमाई मैं बरकत नहीं होती है !धन आता हे और चला जाता है ! कारण समझ में नहीं आता !कृपया  मार्ग दर्शन करें !
गुरुदेव :-
पुराणों में वर्णन आता हे कि किन -किन कारणों से लक्ष्मी ऐक द्वार से आकर दूसरे से निकल जाती है !पुराणों मैं कहते हें कि जिस घर में कलह-कलेश हो ,महिलाअपने नैनो से आंसू बहाती रहें और पुरुश अपना रोब दिखाते रहें ! घर की व्यवस्था ठीक न हो , घर में वस्त्र मैले हों ,वाणी मैली हो ,और वस्तुएँ  बिखरी पडी हों ,बच्चे बडों का सम्मान न करें ,और संसार के मालिक का नाम न लिया जाता हो , अपने हातों से पवित्र सेवा कार्य न होता हो ,उस घर मैं लक्ष्मी का बास नहीं होता ! अपने अधिक परिश्रम से अगर कोई लक्ष्मी घर मैं ले भी आए तो वहां बरकत नहीं होती !

Sunday, May 13, 2012

प्रशन जीवन के लिए सब से महत्त्वपूर्ण कया हे






प्रशन :-जीवन के लिए सब से महत्त्वपूर्ण  कया हे 
पूज्य गुरुदेव :-
मनुष्य के गुण उसके जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं ! संपत्ति तो संसार मैं ही रह जायेगी यहीं कमाई जाती है , लेकिन गुण तो जन्म जन्मानतर तक काम आयेंगे !आपका स्वच्छ अंतर्मन , निर्मल स्वभाव इस दुनिया मैं भी आपको सुखी करेगा और अगली दुनिया मैं भी सुखी करेगा !सजी हुई आत्मा आपको उच्च  सिंहासन पर बैठाएगी !आपका निर्मल ह्रदय परम प्रभु का आसन बनेगा ! आपके मन में उठती हुई भावनये आपको अपने प्रभु का चिंतन करने के लिए तत्पर करेगी ! इसलिए दुनिया की कोई भी दौलत इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितने गुण !


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Posted By Madan Gopal Garga to jigyasa aur samadhan at 5/13/2012 08:04:00 PM

(1)जीवन के लिए सब से महत्त्वपूर्ण कया हे

(1)
प्रशन :-जीवन के लिए सब से महत्त्वपूर्ण  कया हे 
पूज्य गुरुदेव :-
मनुष्य के गुण उसके जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं ! संपत्ति तो संसार मैं ही रह जायेगी यहीं कमाई जाती है , लेकिन गुण तो जन्म जन्मानतर तक काम आयेंगे !आपका स्वच्छ अंतर्मन , निर्मल स्वभाव इस दुनिया मैं भी आपको सुखी करेगा और अगली दुनिया मैं भी सुखी करेगा !सजी हुई आत्मा आपको उच्च  सिंहासन पर बैठाएगी !आपका निर्मल ह्रदय परम प्रभु का आसन बनेगा ! आपके मन में उठती हुई भावनये आपको अपने प्रभु का चिंतन करने के लिए तत्पर करेगी ! इसलिए दुनिया की कोई भी दौलत इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितने गुण !

Friday, May 11, 2012

पूज्य गुरुदेव:- आज संसार मैं अनेकों संत ,

पूज्य गुरुदेव:- 
आज संसार मैं अनेकों संत ,पंथ , ग्रन्थ ,धारणाएं हैं ! ऐसे मैं पता ही नहीं चल पाता की वास्तव मैं कल्याण  का मार्ग कौनसा है ?
महाराजश्री :-
मनुष्य जीवन मैं  एक पंथ हो ,एक ग्रन्थ हो ,एक संत हो ,एक मन्त्र हो ! हमेशा एक मार्ग का अवलम्बन होना चाहिए !एक गुरु की कृपा ,एक मन्त्र का आधार ,और एक ग्रन्थ का प्रकाश अगर घर मैं हो  तो बस वही कल्याण का मार्ग है !

Wednesday, May 9, 2012

जिग्यासा और समाधान धन आता हे और चला जाता है



जिग्यासा और समाधान 
प्रशन :-
हम प्रयास बहुत   करते हैं लेकिन  कमाई मैं बरकत नहीं होती है !धन आता हे और चला जाता है ! कारण समझ में नहीं आता !कृपया  मार्गदर्शन करें !
गुरुदेव :-
पुराणों में वर्णन आता हे कि किन -किन कारणों से लक्ष्मी ऐक द्वार से आकर दूसरे से निकल जाती है !पुराणों मैं कहते हें कि जिस घर में कलह-कलेश हो ,महिला अपने नैनो से आंसू बहाती रहें और पुरुश अपना रोब दिखाते रहें ! घर की व्यवस्था ठीक न हो , घर में वस्त्र मैले हों ,वाणी मैली हो ,और वस्तुएँ  बिखरी पडी हों ,बच्चे बडों का सम्मान न करें ,और संसार के मालिक का नाम न लिया जाता हो , अपने हातों से पवित्र सेवा कार्य न होता हो ,उस घर मैं लक्ष्मी का बास नहीं होता ! अपने अधिक परिश्रम से अगर कोई लक्ष्मी घर मैं ले भी आए तो वहां बरकत नहीं होती !


Tuesday, May 8, 2012

जो बात दुआ


जो बात दुआ 

गुरु ज्ञान की खान है

गुरु ज्ञान की खान है 
बांटत है दिन रात !
पाए कोई बडभागी 
मिटे जन्मों क़ा मेल !!