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See Guruji giving blessings in the end

The prashna & answers are taken from Dharamdoot.




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Sunday, April 24, 2011

पुज्य गुरुदेव !ब्रह्मज्ञान क़ा मार्ग क्या हे ?

जिज्ञासु  :  पुज्य गुरुदेव !ब्रह्मज्ञान  क़ा मार्ग क्या हे ?
 महाराजश्री :-गुरु के प्रति श्रद्धा हे ,माता पिता के प्रति श्रद्धा हे ,अपने धर्म  के प्रति श्रद्धा हे , उसे और दृढ़ करते चले  जाओ ! यदि आप ऐसा करेंगे तो आप आगे बढ़ सकते हैं ! ब्रह्म ज्ञान क़ा मार्ग यही है ! भक्ति की तरफ चलने क़ा मार्ग यही है कि अपनी श्रद्धा को गहरा करो समर्पण के भाव जगाओ !


Wednesday, April 20, 2011

जिज्ञासु :- पूज्य गुरूदेव ! कहते है की कर्मबंधन के

जिज्ञासु :- पूज्य गुरूदेव ! कहते है की कर्मबंधन के कारण संसार में जन्म लेना पड़ता है ! यदि यह सच है तो क्या कर्म हम बंधन में बंधने के लिए कर्म करते है !
महाराजश्री :-सारे शास्त्र कहते है की कर्म बंधन के कारण है ! जब आप कर्म करते है तो बंधन के जाल में बंध जाते हें !भगवान कृष्ण ने संसार को एक ओर विज्ञान दिया ! उन्होंने कहा की कर्म बंधन का कारण नहीं बल्कि आसक्ति बंधन का कारण हें ! यदि किसी कर्म में आसक्ति हो गई तो वह बंधन का कारण बनेगी ! इसीलिए कहते है की कर्म करो लकिन निष्काम भाव से करो ! कर्म करते हुए फल की इच्छा न करो !

Monday, March 21, 2011

जिज्ञासु :- पूज्य गुरुदेव ! क्रोध व्यक्ति के लिए बाधक




जिज्ञासु :- पूज्य गुरुदेव ! क्रोध व्यक्ति के लिए बाधक होता हे , परन्तु हमारे कुछ ऋषी मुनि जैसे कि विश्वामित्र ही क्रोध को नहीं छोड़ पाए फिर भी उनकी भक्ति चरम तक पहुँची ! प्रार्थना है कि मेरी इस जिज्ञासा क़ा समाधान करने की कृपा करें कि यदि क्रोध मात्र एक दोष नहीं छुटता तो धी भक्ति सफल हो सकती है !

महाराजश्री :-ऐसा नहीं है कि क्रोधी व्यक्ति भक्ति नहीं कर सकता , अथवा उसकी भक्ति सफल नहीं होती , वह भक्ति भी कर सकता है , उसकी भक्ति सफल भी हो सकती है लेकिन भक्ति द्वारा वह हो दिव्य शक्ति उपार्जित करता है वह क्रोध के कारण क्षीण हो जाती है ! विश्वामित्र के साथ भी ऐसा ही हुआ ! वे तपस्या के द्वारा जो पुण्य , जो शक्ति उपार्जित करते थे वह उनके क्रोध करने से नष्ट हो जाती थी ~ और उनकी वर्षों की तपस्या व्यर्थ हो जाती थी ! इसीलिए बहुत चाहने पर भे वे ब्रह्मर्षि पद को तब तक न पा सके जब तक उनहोंने अपने क्रोध पर पुरी तरह विजय प्राप्त न कर ली और उनकी भक्ति सफल तभी हुई जब वे क्रोध से रहित हो गए !

Wednesday, March 9, 2011

मन को अच्छे मार...





मन को अच्छे मार्ग पर चलाने के लिये चार सीढ़ियॉ हैं ! 1-सत्य का स्वीकार ! 2-संसार में उपरामता ! 3-आचरण की पवित्रता तथा उच्चता ! 4-पापों के लिये भगवान से क्षमा प्रार्थना !


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Posted By Madan Gopal Garga to AMRIT VANI Good thoughts by Param Pujay SUDHANSHUJI Maharaj at 2/23/2011 10:29:00 PM

Wednesday, February 23, 2011

अपनी संतान को धन नहीं उत्तम गुण दीजिए

जिज्ञासु : पुज्य गुरुदेव ! मेरी उम्र पचपन साल से ऊपर हो चुकी है ! अभी तक बच्चों के लिए न तो ठीक से कुछ बचत कर पाया हूं और न ही घर आदि बनवा सका हूं ! सारा पैसा तो उनकी पढाई में ही खर्च हो जाता है ! पत्नी कहती है कि तुमने बच्चों के लिए किया ही क्या है ? ऐसे में मुझे स्वंय पर ग्लानि होती है ! कृपया मर्गदर्शन करें !

महारा्जश्री :अपनी संतान को धन नहीं उत्तम गुण दीजिए ! सन्तान को सुखी बनाने के लिए संग्रह करने वाला पिता हितकर नहीं होता ,उनको संग्रह नहीं संस्कार देने चाहिए ! आपकी सन्तान अच्छे संस्कारों से युक्त होगी तो आपके घर में सुख समृद्धि ही नहीं स्वर्ग का वातावरण होगा ! अपनी संतान को ऐसा योग्य बना दो कि तुम से भी बढकर योग्य बन सके !
"पूत सपूत तो क्यों धन संचय , पूत कपूत तो क्यों धन सचय "
अगर बेटा सपूत है तो उसके लिए धन जोडने की जरूरत ही नहीं,क्यों कि वह लायक बेटा स्वयं ही इतना कमा लेगा कि उसे आपकी कमाई की जरूरत ही नहीं होगी ! अगर बेटा कपूत हे तो उसके लिए पैसा इकठा नहीं करना चाहिए अगर कर लोगे तो वह दौलत बरबाद कर देगा !बेहिसाब पैसे से सन्तान का पतन शुरु हो जाता नै ! सन्तान को लेकर गलत कमाई से बचिए !सबसे बडी दौलत आपकी सन्तान है !

Sunday, February 6, 2011

मन से अशान्ति नहीं जाती


जिज्ञासु : पुज्य गुरुदेव ! बार -बार प्रयास करने पर भी मन से अशान्ति नहीं जाती ! एक व्याकुलता,एक बेचैनी बनी ही रहती है ! कृपया कोई उपाय बतायें जिससे मैं शान्तिपूर्वक अपने कार्य और भगवान की भक्ति कर सकूँ !

महाराजश्री : जब तक इंसान बच्चों जैसा भोलापन अपने अंदर रखता है , उसके अंदर अशांति नहीं रहती ! जैसे -जैसे माया की परत व्यक्ति के ऊपर बढती जायेगी , वैसे-वैसे मन अशांत होगा ! मनुष्य जितना कृत्रिम है ,बनावटी है ,दिखाने वाला है उतना ही अशांत है और जितना सरल ,सहज ,प्रेमपूर्ण है उतना ही वह शांत एवं आनदित है ! दुनिया में कोई अशांत होना नहीं चाहता लकिन कार्य अशांति के करता है ! अशांति वाले कार्य करके शान्ति कैसे संभव होगी ! आसक्ति रहित होकर कर्तव्य की भावना से सहज सरल होकर कार्य कीजिए शांति अवश्य अंदर आयेगी !